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Thursday, December 21, 2017

पूंजीवाद में कानूनी लूट

बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अततः अदालत का फैसला आ गया। अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। आरोपियों में ए.राजा और कानीमोझी जैसे बड़े नेता थे तो अनिल अंबानी की कंपनी के बड़े अधिकारी भी।
न्यायाधीश ने बहुत कड़े शब्दों में फैसला सुनाया और सी.बी.आई. को कटघरे में खड़ा किया। कम से कम इस मामले में सी.बी.आई. पर स्वतः लापरवाही का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उसे नियंत्रित करने वाली वर्तमान सरकार का पूरा हित था इसमें। कुछ समय पहले यदि करुणानिधि की मोदी से दोस्ताना मुलाकात में कुछ छिपा हो तो आश्चर्य नहीं कहा जा सकता।

Friday, September 15, 2017

छकड़ों और बैलगाड़ियों के देश में बुलेट ट्रेन

        देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। गनीमत यह है कि यह उसी तरह बैलगाड़ी पर लदकर नहीं आ रही जैसे टीवी बैलगाड़ी पर लदकर गांव पहुंचता है। 
यह बुलेट ट्रेन जापान से आ रही है और संघी प्रधानमंत्री कें हिसाब से लगभग मुफ्त में। बस वे यह बताना भूल गये कि जापानी अपने सारे प्रयास के बावजूद अमरीकियों को यह बुलेट बेचने में नाकामयाब रहे हैं। कि जापान की बुलेट ट्रेन बनाने वाली कंपनियां आर्डन न मिलने से परेशान हैं। कि इस बुलेट ट्रेन के सारे साजो-सामान जापान से आयेंगे- दो गुने या तीन गुने दाम पर। कि यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पिछड़े देशों में व्यवसाय करने का पुराना तरीका है। कि पांच साल में यह कीमत रुपये के अवमूल्यन के कारण पांच से दस गुना बढ़ चुकी होगी। कि इस सौदे की आड़  में अन्य रक्षा सौदे किये जा रहे हैं। कि जापानी दोस्त के इस उपहार की कीमत एशिया में जापानी और अमरीकी साम्राज्यवादियों का लठैत बनकर चुकानी पड़ेगी। 

Friday, August 25, 2017

निजता का अधिकार: मजदूर वर्ग क्यों और कैसे जश्न मनाए ?

24 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। इस अधिकार का विरोध करने वाली सरकार से लेकर सारे पूंजीवादी बुद्धीजीवी इस फैसले का गुणगान कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश में सब कुछ बदल जाने वाला है।
मजदूर वर्ग के लिए यह सहज सा सवाल है कि संविधान में पहले से दर्ज मौलिक अधिकारों का क्या हाल है ? क्या मजदूर और एवं अन्य मेहनतकश उन मौलिक अधिकारों का जरा भी इस्तेमाल कर पा रहे हैं ? क्या एक अदना सा सरकारी अधिकारी, थाने का इंस्पेक्टर, फैक्टरी का मालिक और मकान मालिक लगातार मजदूरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करते ? क्या मजदूर इन अधिकारों को लागू करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है ? जब इस पूंजीवादी व्यवस्था में उसके जिन्दा रहने की स्थिति ही खतरे में पड़ी हुई हो तो इन मौलिक अधिकारों का क्या मतलब रह जाता है। 

Wednesday, August 23, 2017

फासीवादियों और प्रतिक्रियावादियों के एजेण्डे को आगे बढ़ाता फैसला

आखिरकार देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलमान औरतों को उनके जुल्मी पतियों से मुक्ति दिला दी, उस सर्वोच्च न्यायालय ने जिसने बामुश्किल सप्ताह भर पहले अखिला उर्फ हादिया मामले में यह कहा था कि चैबीस साल की लड़की या औरत अपने बारे में फैसला करने में सक्षम नहीं है। यही नहीं संघी फासीवादियों के सुर में सुर मिलाते हुए उसने ‘लव-जिहाद’ के लिए प्रयासरत आई एस आई एस के बारे में जांच का भी आदेश देश की सर्वोच्च आतंकवाद विराधी एजेन्सी को दे दिया।

Saturday, July 22, 2017

बजबजाती पूंजीवादी राजनीति की दलित पक्षधरता

       यह लाक्षणिक है कि एक ही समय रामनाथ कोविन्द राष्ट्रपति भवन में सुशोभित होने के लिए चुने गये जबकि बहन मायावति ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। मायावति ने इस्तीफा देने का कारण भाजपा द्वारा उन्हें दलित उत्पीड़न पर बोलने से टोका जाना बताया जबकि भाजपा ने गाजे-बाजे के साथ एक दलित को राष्ट्रपति भवन में प्रतिष्ठित किया। दलित प्रेम के इस मौसम में कांग्रेसी व अन्य भी पीछे नहीं रहना चाहते थे। उन्होंने भी एक अन्य दलित मीरा कुमार को राष्ट्रपति भवन का अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। 
महत्वपूर्ण बात यह है कि रामनाथ कोविन्द, मीरा कुमार, मायावती या भाजपा कोई भी बहुसंख्यक दलितों के लिए यानी दलित सर्वहारा के लिए लड़ने वाला नहीं है। यही नहीं, हिन्दुत्वादी भाजपा तो जातिगत उत्पीड़न को जारी रखने का प्लेटफॉर्म है। बाकी ज्यादा से ज्यादा दलित पूंजीपति वर्ग या मध्यम वर्ग के झंडादरबार हो सकते हैं। जहां तक राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों की बात है, वे पालतू दलितों की किस्म के लोग हैं। एक को फासीवादी हिन्दुत्ववादियों ने पाला-पोसा था तो दूसरे को ‘धर्मनिरपेक्ष’ कांगेस ने।

Thursday, May 11, 2017

पूर्ण विद्रोह ही अवस्था में कश्मीर

कश्मीर घाटी इस समय पूर्ण विद्रोह की अवस्था में है। भारत के शासक वर्गीय हलकों में बहुत सारे लोग इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि पिछले दो दशकों में सबसे खराब हालात हैं। स्थिति वहां पहुंच गयी है जहां सेना द्वारा फर्जी या असली मुठभेड़ की जगह निहत्थे लोग पहुंच कर सेना के सामने खड़े हो जा रहे हैं। भारी मात्रा में छात्राएं भी अब सड़क पर उतर आयी हैं। सेना के स्थानीय मुखबिर भी अब कोई सूचना नहीं पहुंचा रहे हैं। 
खराब हालात का एक सूचक चुनाव आयोग द्वारा अनन्तनाग का चुनाव रद्द करना रहा। श्रीनगर चुनाव में महज पांच-छः प्रतिशत वोट पड़ने के बाद भारत सरकार अब अपनी और ज्यादा फजीहत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। 

Saturday, April 22, 2017

बाबरी मस्जिद मामले में न्याय का ढोंग

आखिरकार भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुंच गया कि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने के मामले में भाजपा नेताओं पर षडयंत्र का मुकदमा चल सकता है। इस नतीजे पर पहुंचने में देश की न्याय व्ववस्था को पूरे पच्चीस साल लग गये। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने दो साल में फैसला सुनाने का आदेश दिया है पर यह शायद ही हो। जब तक फैसला आयेगा तब तक मुख्य आरोपी अपने भगवान राम के पास जा चुके होंगे। वैसे भी केन्द्र में भाजपा की सरकार को देखते हुए सी.बी.आई. द्वारा चलाये जा रहे इस मुकदमे का फैसला पहले से ही तय है।
    बाबरी मस्जिद का पूरा मामला ही भारत की समूची पूंजीवादी व्यवस्था के घृणित चरित्र का आइना है। इस मामले को उठाककर मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं का साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करते हुए भाजपा ऊपर उठी और आज पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र और सोलह प्रदेशों में सत्ता में है। बाकी पूंजीवादी पार्टियां में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि इसके खिलाफ दृढ़ता से खड़े हों। भारतीय संसद अपने सामने बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने का नजारा देखती रही। रही देश के न्यायालयों की बात तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के खिलाफ हुआ। होना तो यह चाहिए था कि इस अपराध के लिए भाजपा के शीर्ष नेताओं को जेल में डाला जाता पर हुआ यह कि उनके खिलाफ महज मुकदमा चलाने का फैसला सुनाने में सर्वोच्च न्यायालय ने पच्चीस साल लगा दिये।

Monday, March 20, 2017

वाजपेयी -> आडवाणी-> मोदी ->योगी

मोदी-शाह की रंगा-बिल्ला की जोड़ी ने अपने सारे उदारपंथी समर्थकों के गालों पर तमाचा जड़ते हुए ‘योगी’ आदित्यनाथ (अजय सिंह बिष्ट) को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बैठा दिया। जैसा कि किसी ने टिप्पणी की, यह ’डेवलेपमेन्ट’ की नयी ‘स्पेलिंग’ है। इसमें यह जोड़ना होगा कि मोदी के ‘डेवलेपमेन्ट’ की यही सही स्पेलिंग है।
भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी व्यवस्था के उदारपंथी पैरोकारों ने पिछले कुछ सालों में मोदी के खूनी चेहरे को धो-पोंछकर और लीप-पोतकर काफी ‘मानवीय’ बनाने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने हर संभव तर्क पेश किये हैं। मोदी के हर कुकर्म को ढंकने की कोशिश की है। 

मजदूर वर्ग के खिलाफ एक पूर्व निश्चित फैसला

जैसा कि अंदेशा था, भारत के एक सम्मानित न्यायालय ने पूंजीपति वर्ग को आश्वस्त करने के लिए और उसकी बदले की भावना को तुष्ट करने के लिए मारुति मामले में तेरह मजदूरों को आजीवन कैद की सजा सुना दी। इसी के साथ चार अन्य मजदूरों को पांच साल की तथा चौदह को उनके जेल प्रवास की सजा सुनाई गई। इन पर जुर्माना भी किया गया जिसके अदा होने तक इन्हें जेल में रहना होगा। आजीवन कारावास पाने वालों में बारह तत्कालीन यूनियन के पदाधिकारी थे।  
17 जुलाई 2012 की घटना के बाद 148 मजदूरों को सरकार ने पकड़ कर बन्द कर दिया था। काफी मशक्कतों के बाद करीब तीन साल बाद उन्हें जमानत मिलनी शुरू हुई। कुछ को तो अंत तक जमानत नहीं मिली। माननीय न्यायालय ने यह नहीं बताया कि बेकसूर घोषित किये गये 117 मजदूरों के जेल में बिताये गये समय का क्या होगा। इनकी नौकरी से बर्खास्गी का क्या होगा ? न्यायालय इन छोटे-मोटे मामलों की चिन्ता नहीं करती। उसे तो पूंजीपति वर्ग की, उसके मुनाफे की, उसके निवेश की चिन्ता होती है। मजदूर और उनका जीवन उसके लिए उसी तरह महत्वहीन है जैसे पूंजीपति वर्ग के लिए। 

Saturday, March 11, 2017

विधानसभा चुनाव परिणामों के खतरनाक संकेत

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा के चुनावों ने स्वयं भाजपा को भी चौंका दिया होगा। वे दावा तो प्रचण्ड बहुमत का कर रहे थे, पर इस पर किसी को भी यकीन नहीं था-भाजपा समर्थक ‘एक्जिट पोल’ वालों को भी नहीं। उनमें से भी किसी ने भाजपा गठबंधन को तीन सौ से ज्यादा सीटें उत्तर प्रदेश में नहीं दी थीं। इसके पहले जमीनी स्तर की सारी रपटें भी किसी एक के बहुमत से इंकार करती थीं।
ऐसे में यदि बसपा अध्यक्ष मायावती दावा करती हैं कि वोट मशीनों में छेड़छाड़ की गई है तो इसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। खासकर बसपा के इतने बुरे प्रदर्शन की किसी को उम्मीद नहीं थी। मुसलमान बहुल इलाकों से भी भाजपा को वोट मिलने की बात यदि सच है तो इस आरोप की सत्यता बहुत बढ़ जाती है। वैसे अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के पुराने रिकाॅर्ड को देखते हुए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता विशेषकर स्वयं भाजपा के भीतर भी इन दोनों का भविष्य दांव पर लगा हुआ था। ऐसे में ये किसी भी हद तक जा सकते थे। 

Wednesday, February 1, 2017

मोदी सरकार का चौथा बजट: वही लूट, वही बांट बखरा

अरुण जेटली ने आज मोदी सरकार का चौथा बजट पेश किया। विपक्षी पार्टियां परेशान थीं कि पांच राज्यों में विधान सभा के चुनाव के मद्देनजर मोदी सरकार जनता पर न जाने क्या-क्या लुटा देगी। पर ऐसा न होना था और न हुआ। 
अभी कल ही सरकार द्वारा पेश किये गये आर्थिक सर्वेक्षण में स्वीकार किया गया था कि नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर आधे से लेकर एक प्रतिशत तक प्रभाव पड़ सकता है यानी आज की कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद में इतनी गिरावट आ सकती है। यह पचहत्तर हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख करोड़ तक की गिरावट है। गौरतलब है कि यह ऐसी गिरावट है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। 

Sunday, January 1, 2017

झूठा-मक्कार मदारी चौराहों पर नहीं आया

इकत्तीस दिसंबर को देश में न जाने कितने लोग देश के छोटे-बड़े चौराहों पर हाथों में जूते-चप्पल लिये खड़े थे। कुछ ने तो रात ठंडे पानी में भी भिगो रखे थे।   
इन सबको हर जहग नरेन्द्र मोदी का इंतजार था। मोदी ने कह रखा था कि उन्हें केवल पचास दिन चाहिए यानी तीस दिसंबर तक। यदि इस दिन तक देश में काला धन खत्म नहीं हुआ तो उन्हें जिस चैराहे पर बुलाया जायेगा, वे आ जायेंगे। पर मोदी किसी भी चौराहे पर नहीं पहुंचे। 

Saturday, December 17, 2016

सवालों से भागता संघी प्रधानमंत्री

संघी प्रधानमंत्री के बचाव में उतरी भाजपा ने संसद का शीत सत्र स्वयं ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया। यह संसद के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि स्वयं सत्ता पक्ष ने ही संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। यह तथ्य इतना स्पष्ट था कि निर्वासन में भेजे जा चुके भाजपा के अपमानित बुजुर्ग आडवाणी ने संसद से इस्तीफे की इच्छा जाहिर कर दी। 
ऐसा नहीं था कि संसद में नोट वापसी पर चर्चा से लाइनों में ठिठुरती जनता को कोई राहत मिल जाती। न ही रोजगार छिन जाने या ठप हो जाने से दुखी लोगों को कोई सहायता मिल जाती। न ही वे लोग वापस जीवन जीवन पा जाते जो लाइनों में खड़े-खड़े काल-कवलित को गये। न ही इससे काला धन सरकार की तिजोरियों मे आने लगता। 

Wednesday, November 9, 2016

काला धन खत्म करने का पुराना खेल

आखिरकार संघी प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी ने काले धन पर अपनी बहु-प्रतीक्षित ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी। उन्होंने पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को निरस्त कर दिया। 
 पर उनकी काले धन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ऐसी थी कि देश में काले धन के सबसे बड़े मालिक इसकी वाहवाही करने लगे। देश के बड़े पूंजीपतियों ने बयान जारी कर इसका समर्थन किया। यहां तक कि बालीवुड की हस्तियों ने भी इसका समर्थन किया।

Monday, November 7, 2016

अक्टूबर सर्वहारा समाजवादी क्रांति अमर रहे !

इस सात नवंबर से रूसी क्रांति का शताब्दी वर्ष शुरु हो रहा है। सात नवंबर 1917 (पुराने रूसी कैलेन्डर के हिसाब से 25 अक्टूबर 1917) को बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में मजदूर वर्ग ने पूंजीपति वर्ग की सत्ता को उखाड़ फेंक कर रूस में मजदूर वर्ग का राज कायम किया था। रूस के इस मजदूर राज ने इसके पश्चात इतिहास की पूरी धारा बदल दी। इसके बाद का विश्व इतिहास रूसी क्रांति और सोवियत समाजवाद से बहुत गहरे से प्रभावित रहा है। चाहे दुनिया में एक समाजवादी खेमे का अस्तित्व में आना रहा हो (एक तिहाई मानवता को समेटने वाले), चाहे ‘कल्याणकारी’ पूंजीवादी राज्य रहा हो या फिर गुलाम देशों की मुक्ति के आंदोलन, सभी का सीधा संबंध रूसी क्रांति और समामजवाद से रहा है।

Friday, October 21, 2016

नंगई की सीमा पार करता पूंजीवादी प्रचारतंत्र

इस समय देश का पूंजीवादी मीडिया सारी शर्मो-हया त्याग कर सरकार का भोंपू बन गया है। वह समूची पूंजीवादी व्यवस्था का प्रचारतंत्र होने के बदले देश की संघी मोदी सरकार का प्रचारतंत्र बन गया है।
पूंजीवादी मीडिया ने अपनी निस्पक्षता प्रदर्शित करने के लिए कुछ उसूल बना रखे थे। इसमें प्रमुख यह था कि समाचार और विचार को अलग-अलग रखा जाये। विचार के लिए संपादकीय पृष्ठ रहते थे जबकि समाचार को स्त्रोतों के हवाले से प्रस्तुत किया जाता था। ‘आरोप है‘ ‘पुलिस’ या ‘सरकार’ का कहना है, ‘कथित अपराधी’ इत्यादि शब्दावली इसका हिस्सा होती थी। 

Saturday, October 8, 2016

देशभक्ति के बोझ को हटाकर निकलता सच

पाकिस्तान पर अपनी फतह का डंका पीटने के दस दिन बाद भी संघियों की मोदी सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। बल्कि पहले देशभक्ति की दहशत में चुप लगाकर बैठे लोग भी अब बोलने लगे हैं और मोदी सरकार के दावों पर सवाल उठाने लगे  हैं । अब केवल संघी मोदीभक्त और मोदी का झंडा बुलन्द किये हुआ पूंजीवादी प्रचारतंत्र ही झूठ के साथ खड़ा दीख रहा है।
जब 29 सितंबर को केन्द्र सरकार ने सेना से पाकिस्तान नियंत्रित कश्मीरी इलाकों में आतंकवादी ठिकानों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की घोषणा करवाई तभी मोदी भक्तों को छोड़कर सभी के लिए यह स्पष्ट था कि या तो यह एकदम झूठ है या फिर वैसी ही घटना जो नियंत्रण रेखा पर जब-तब होती रहती है। मामला इतना स्पष्ट था कि भारत के सारे दावों के बावजूद विदेशी मीडिया, सरकारें और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ भी सच मानने को तैयार नहीं था। पाकिस्तान सरकार तो इसे नकार ही रही थी।

Friday, September 16, 2016

संघी प्रधानमंत्री की स्वामीभक्ति

विदेश यात्रा का कोई भी मौका न चूकने वाले संघी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो अपना अच्छा-खासा समय विदेशों में गुजारते हैं, इस बार एक खास मौके पर विदेश नहीं गये हैं। इसके बदले उन्होंने उपराष्ट्रपति हामिद अन्सारी को वहां भेज दिया हालांकि संबंधित जगह पर देश के प्रधानमंत्री ही जाते रहे हैं। ऐसा करके नरेन्द्र मोदी और भाजपा सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया। 
इस समय वेनेज्युएला के मार्गरीटा द्वीप पर गुट निरपेक्ष आंदोलन की बैठक चल रही है। भारत गुट निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में था और देश के प्रधानमंत्री इसकी शिखर बैठकों में जाते रहे हैं। 

Tuesday, September 6, 2016

कश्मीरी जनता से फर्जी बातचीत का तमाशा

कश्मीर के लोगों को लगातार दो महीने से घरों मेें कैद रखने वाली भारतीय राज्य सत्ता के नुमाइंदे (संयुक्त संसदीय प्रतिनिधि मंडल) कश्मीर में अपने ही जैसे लोगों से बातचीत कर लौट आये। कश्मीर में संगीनों से राज कर रही राज्य सत्ता ने एक और रस्म अदायगी की। इसकी ओर से बोलते हुए गृहमंत्री ने बयान दिया कि कश्मीरी जनता के नेताओं को कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत में विश्वास नहीं है। 
लोगों को घरों में और उनके नेताओं को जेलों में कैद कर संगीनों के दम पर हुकूमत कर रही राज्य सत्ता की जम्हूरियत और इंसानियत की अपनी ही परिभाषा है। रही कश्मीरियत की बात तो उसे नष्ट करने के लिए भारतीय राज्य सत्ता ने हरचन्द कोशिश की है।

Wednesday, August 31, 2016

2 सितंबर की आम हड़ताल को सफल बनाओ !

2 सितंबर की प्रस्तावित आम हड़ताल ने पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार में इतनी बैचैनी पैदा कर दी है कि हड़ताल को असफल करने के लिए संघी बड़बोले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की घोषणा कर दी। अब से राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी प्रतिदिन 240 रुपये के बदले 350 रुपये होगी। इस घोषणा के जरिये वित्त मंत्री ने उम्मीद की होगी कि ठेके और असंगठित क्षेत्र के मजदूर आम हड़ताल में शामिल नहीं होंगे।
पिछले साल 2 सितंबर की आम हड़ताल में बड़ी संख्या में ठेके और असंगठित क्षेत्र के मजदूर शामिल हुए थे। उन्होंने ही सबसे ज्यादा लड़ाकू भावना का परिचय दिया था। पूंजीपति वर्ग बखूबी जानता है कि यदि मजदूर वर्ग का यह हिस्सा, जो वैसे भी मजदूर आबादी का नब्बे प्रतिशत से ज्यादा है, संघर्ष में उतर आया तो उसके लिए बेहद मुश्किल खड़ी हो जायेगी। अभिजात मजदूरों को तो उनके पालतू और व्यवस्थापरस्त नेताओं के जरिये बहलाया-फुसलाया जा सकता है पर इसे नहीं। पिछली आम हड़ताल में इन मजदूरों ने अपने लड़ाकूपन से पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार को ही नहीं, अभिजात मजदूर नेताओं को भी काफी परेशान किया था। इन मजदूरों पर लगाये गये फर्जी मुकदमे अभी भी चल रहे हैं।